अपनों की छत तो मिली पर खुशियों का आशियाना छीना: गरीबों के सामुदायिक भवन पर निगम की ‘कुर्सी’ का पहरा, सड़क पर तिरपाल तान शादी-मातम मनाने को मजबूर बहतराई की बस्ती
बिलासपुर। जब बहतराई चौक स्थित ‘रिकॉन्डो बस्ती’ की पुरानी झुग्गियों पर बुलडोजर चला था, तो बेघर होते गरीब परिवारों की नम आंखों में एक उम्मीद बंधी थी। प्रधानमंत्री आवास योजना के पक्के मकानों के साथ उन्हें यह भरोसा दिलाया गया था कि उनके सुख-दुख, बेटी के ब्याह और अपनों के तीज-त्योहारों के लिए एक सामुदायिक भवन भी मिलेगा। सरकार की मंशा साफ थी कि जो बेबस परिवार महंगे मैरिज हॉल या बड़े भवनों का किराया जुटाने में असमर्थ हैं, वे अपने जीवन के अहम पड़ावों को इसी भवन की छांव में गरिमा के साथ मना सकें। मगर बिलासपुर नगर निगम की संवेदनहीन कार्यप्रणाली ने इस मानवीय सोच को फाइलों के नीचे दबा दिया है।
जिस भवन की देहरी पर गरीबों की खुशियां और मंगल गीत गूंजने थे, वहां आज सरकारी फाइलों का ढेर और निगम अफसरों की कुर्सियां सजी हैं। पहले इस भवन को मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय बनाया गया और फिर इसे जोन-7 के दफ्तर में तब्दील कर दिया गया। विडंबना यह है कि जोन क्रमांक-7 के पास राजकिशोर नगर के पूर्व कार्यालय सहित जिला खेल परिसर में पर्याप्त जगह और संसाधन मौजूद हैं, जहां अफसर और कर्मचारी आराम से बैठ सकते हैं। इसके बावजूद गरीबों के हिस्से के इस भवन से निगम अपना कब्जा हटाने को तैयार नहीं है।
नतीजतन, पाई-पाई जोड़कर गुजर-बसर करने वाले इन गरीब परिवारों को किसी अपने की शादी हो या गमी का मातम, भरी धूप और बारिश में सड़क किनारे बांस-बल्ली लगाकर तिरपाल तानना पड़ता है। जो निगम सड़क पर फल और सब्जी बेचने वाले छोटे-मोटे गरीबों का सामान पलक झपकते ही अतिक्रमण बताकर जब्त कर लेता है, वही निगम वर्षों से गरीबों के हक पर कुंडली मारकर बैठा है।
पूर्व वार्ड पार्षद संतोष साहू ने इस बेबसी पर गहरा आक्रोश जताते हुए कहा कि जिस भवन को गरीबों की सुविधा के लिए बनाया गया था, उस पर प्रशासनिक कब्जा जमाकर जनता के साथ छलावा किया जा रहा है। यदि निगम ने तत्काल इस भवन को खाली नहीं किया, तो बस्ती के लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।
वहीं दूसरी ओर, जोन-7 कमिश्नर का कहना है कि वे जल्द ही इस भवन को रहवासियों को सौंपने का प्रयास करेंगे।
अब सवाल यह है कि प्रशासनिक आश्वासनों के बीच यह ‘प्रयास’ कब मुकम्मल होगा? क्या बहतराई के इन बेबस परिवारों को अपनी खुशियों और आंसुओं के लिए यूं ही हमेशा धूल भरी सड़कों पर तिरपाल का सहारा लेना पड़ेगा?

