ममता की पुकार: जब एक माँ बनी बेजुबानों का सहारा
बिलासपुर की तपती दोपहर में सूरज आग उगल रहा था। सड़कें सूनी थीं और गरम हवा के थपेड़े शरीर को झुलसा रहे थे। सुप्रिया , जो अभी-अभी अपने मायके से लौटी थी, अपनी गोद में एक साल के मासूम बच्चे को संभाले अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी। बच्चा गर्मी और थकान से बिलख रहा था, और सुप्रिया की बस एक ही इच्छा थी कि जल्दी से घर के भीतर जाकर उसे सुकून मिले।
तभी, सन्नाटे को चीरती हुई एक करुण पुकार सुप्रिया के कानों में पड़ी। वह एक छोटे से बछड़े की आवाज़ थी, जो अपनी माँ के लिए व्याकुल होकर तड़प रहा था। सुप्रिया ने चौंक कर देखा, नन्हा बछड़ा बाहर था और उसकी माँ सामने बने एक सामुदायिक भवन की ऊँची चारदीवारी के पीछे कैद थी। बीच में लोहे का एक विशाल गेट था, जिस पर भीतर से ताला जड़ा था।
दो माताओं की बेबसी
दृश्य अत्यंत हृदयविदारक था। एक तरफ सुप्रिया का अपना बच्चा प्यास और गर्मी से बेहाल था, और दूसरी तरफ वह बेजुबान गाय, जो गेट के उस पार से अपने बच्चे को देख तो सकती थी, पर उसे दुलार नहीं सकती थी। बछड़ा बार-बार अपनी माँ के पास जाने की कोशिश करता, और गाय भी भीतर छटपटा रही थी।
आस-पास आलीशान मकान थे, जहाँ लोग कूलर और एसी की ठंडी हवा में चैन की नींद सो रहे थे। किसी को भी बाहर हो रहे इस ‘विछोह’ की परवाह नहीं थी। लेकिन सुप्रिया , जो खुद एक माँ थी, उस बछड़े की व्याकुलता को सह न सकी। एक हाथ में अपने बच्चे को संभाले हुए वह भीषण धूप में डटी रही। उसने गेट खटखटाया, लोगों से मदद मांगी, यहाँ तक कि खुद ताला तोड़ने की कोशिश भी की, पर सफलता नहीं मिली।
साहस और ममता का संगम
हार मानने के बजाय सुप्रिया ने तुरंत फोन घुमाया। पड़ोसियों के सहयोग से उसने उस भवन के ठेकेदार का नंबर निकाला। जब फोन उठा, तो सुप्रिया की आवाज़ में केवल अनुरोध नहीं, बल्कि एक माँ का क्रोध और आदेश था। उसने कड़े शब्दों में चेतावनी दी:
”भाई साहब, या तो आप दस मिनट के भीतर आकर यह दरवाजा खोलिए, वरना मैं अभी किसी को बुलाकर ताला तुड़वा दूंगी। एक नन्हा जीव अपनी माँ के लिए तड़प रहा है, और आप इसे गंभीरता से नहीं ले रहे!”
उसकी आवाज़ की गंभीरता और दृढ़ता ने काम किया। कुछ ही देर में ठेकेदार का आदमी आया और भारी गेट का ताला खोला गया।
एक सुखद मिलन
जैसे ही गेट खुला, बछड़ा दौड़कर अपनी माँ के पास जा पहुँचा। वह पल ऐसा था जिसे देखकर सुप्रिया की आँखों में आँसू छलक आए। गाय ने गहरे स्नेह से अपने बछड़े को चाटना शुरू किया और बछड़ा तृप्त होकर दूध पीने लगा। उस तपती दोपहर में, सुप्रिया के प्रयास से ममता की शीतल धार बह निकली थी।


निष्कर्ष
अक्सर हम सोशल मीडिया पर पशुओं के लिए पानी रखने या दया दिखाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन जब धरातल पर जिम्मेदारी निभाने का वक्त आता है, तो हम अपने घरों के बंद दरवाजों के पीछे छिप जाते हैं। सुप्रिया ने साबित कर दिया कि असली मानवता और ममता वही है, जो केवल अपनों के लिए नहीं, बल्कि हर उस जीव के लिए धड़के जो कष्ट में है।
यदि हर इंसान पशु-पक्षियों के प्रति ऐसा ही अपनत्व दिखाए, तो यह संसार वाक़ई रहने लायक एक खूबसूरत जगह बन जाए



